Pious 102nd Incarnation Day of the True Spiritual Master

संत-महापुरुषों का धरती पर आगमन बड़ा ही सुखकारी होता है। आदिकाल से परमेश्वर के भेजे रूहानी दूत के रूप में संत-महात्मा अवतार धारण कर सृष्टि का उद्धार करने के लिए आते रहे हैं। लेकिन इस घोर कलयुग में जब चहु और स्वार्थ व हर तरह की बुराइयों का बोलबाला है, रूहें विवश होकर तड़प रही हैं। तब सतगुरु मालिक को स्वयं धरती पर आना पड़ा है। क्योंकि काल का असर दुनियावी लोगों पर इतना हो चुका है कि हर किसी के बस में नहीं है कि वह उस से छुटकारा पा सके। अपनी रूहों की कुल मालिक को पहचान होती है और वे उन्हें लेने स्वयं धरती पर अवतार धारण कर आते है। बेशक रूहें अपने पिता को भूल चुकी है, लेकिन वो परम पिता परमात्मा सब जानी-जान है और अपनी भूली-भटकी रूहों को बंदे का चोला पाकर लेने आता है। इस वास्तविकता को निम्नलिखित शब्दों की सहायता से समझाया जा सकता है, जो कि स्वयं पूज्य परम पिता जी द्वारा रचित है-

भूल गए हो तुम हमें (मालिक को)

हम ना तुम्हें भुलाएंगे।

चाहे कुछ भी करें यत्न, वापिस तुम्हें ले आएंगे, काल से तुम्हें छुड़ाएंगे।

आपको बता दे, आज 25 जनवरी का वह दिन, जब शहनशाहों के शहंनशाह परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज ने लोगों का उद्धार करने के लिए अवतार धारण किया। आज शाह सतनाम सिंह जी महाराज के अवतार दिवस को 102 वर्ष पूरे हो चुके है। हर तरफ खुशी की लहर है। आज के दिन को लाखों अनुयायी मानवता भलाई के कार्य कर मनाते है।

आइए जानते है, डेरा सच्चा सौदा के दूसरे अध्यात्मिक गुरु परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज के जीवन के बारे में कुछ रोचक तथ्य।

जीवन परिचय-

परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज ने 25 जनवरी के शुभ दिवस पर अवतार धारण किया। आप जी परम आदरणीय पिता सरदार वरियाम सिंह जी तथा माता आसकौर जी के घर 25 जनवरी 1919 को प्रकट हुए।आप जी ने पूजनीय माता-पिता जी की इकलौती संतान के रूप में 18 वर्ष बाद जन्म लिया। आप जी के पूजनीय पिता सरदार वरियाम सिंह जी अपने पूरे क्षेत्र में सम्मानित शख्शियत थे। वे कई गांवों के जैलदार थे। आप जी श्री जलालआणा साहिब, तहसील डबवाली, जिला सिरसा के रहने वाले थे। बचपन से ही, शाह सतनाम सिंह जी महाराज भगवान के साथ प्यार व भक्ति की भावना रखते थे। परम पिता जी मानव जाति के प्रति बहुत ही दयालुता और सहानुभूति रखते थे। ऐसी हजारों घटनाएँ थीं, जो उनकी पवित्रता की दिव्य शक्तियों की गवाह बनती थी।

दयालुता की मिसाल-

पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज बचपन से ही दयालुता के समुद्र थे। आप जी अपने घरेलू कार्यों के साथ परमार्थी व सामाज हित कार्यों में भी अधिक रूचि लेते थे। यह सच्चाई आस-पास के इलाकों में प्रसिद्ध थी कि जो भी कोई गरीब, जरूरतमंद दर पर आता आप जी ने उसे कभी खाली नहीं लौटने दिया। समय व स्थिति के अनुसार आप जी उनकी झोलीयां अपने दया-मेहर व परोपकारों से भर दिया करते। एक बार इलाके में जबरदस्त सूखा पड़ा, उस स्थिति में कौन किसी जरूरतमंद की मदद करें। सबको अपनी-अपनी पड़ी हुई थी। ऐसे में शहंशाही परिवार ने हर जरूरतमंद की मदद की, जो भी फरियाद लेकर आया यथासंभव परम पिता जी द्वारा उसकी मदद की गई।

सच्चे मुर्शिद पूजनीय शहनशाह मस्ताना जी से मिलाप-

पूजनीय माता जी के पाक-पवित्र संस्कारों के कारण आप जी बचपन से ही परम पिता परमात्मा की भक्ति इबादत किया करते थे। इसी का परिणाम था कि आप जी की मुलाकात पूजनीय बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज से हुई। आप जी को पता चला कि सरसा में पूजनीय मस्ताना जी महाराज ने सच्चा सौदा बना रखा है और वहां पर परमात्मा की निरोल भजन बंदगी कराई जाती है। तो आप जी सीधे सरसा चले आए। जब आप जी की भेंट बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज से हुई तो आप जी असीम सुकून से भर गए। नूर से नूर का ऐसा मिलन हुआ कि आप जी उस पर फिदा हो गए। शहंशाह मस्ताना जी से मिलने के बाद और कोई गुंजाइश बाकी ना रही थी। आप जी पूजनीय शहंशाह मस्ताना जी के ही हो गए।

साईं जी ने मूढे़ पर बैठकर दिया नाम शब्द-

आप जी कई वर्षों तक शहंशाह मस्ताना जी महाराज के सत्संग श्रवण करते रहे। लेकिन नाम शब्द सही समय आने पर ही प्राप्त हुआ। लेकिन यह भी सच्चाई है कि आप जी ने उस से पहले अपने गांव व आस-पास के बहुत जानकारों को पूज्य बेपरवाह जी से खुद नाम शब्द दिलवाया था। इस से पहले आप जी जब भी नाम शब्द के लिए कहते, तो शहंशाह मस्ताना जी महाराज यह कहकर मना कर दिया करते कि आपको नाम साईं सावन शाह जी के हुक्म से खुद बुला कर देंगे। अभी हुक्म नहीं हुआ है और जब वह दिन आया ,14 मार्च 1954, उस दिन गांव घूकांवाली जिला सिरसा में सत्संग था। आप जी को देखकर साईं जी फरमाने लगे हरबंस सिंह जी चलकर अंदर हमारे मुढे़ के पास बैठ जाओ, आज आपको भी दाता सावण शाह जी के हुक्म से नाम की दात मिलेगी। मूढ़े के पास जगह ना होने के कारण, आप जी नाम अभिलाषी अन्य जीवों के साथ पीछे ही बैठ गए। जब साईं जी ने देखा तो आवाज लगाई हरबंस सिंह हमारे पास यहां आकर बैठो। आज तुम्हें स्पेशल नाम देंगे। क्योंकि तुम्हारे से कोई काम लेना है। तुम्हें जिंदाराम का लीडर बनाएंगे।

साईं जी ने बनाया जिंदाराम का लीडर-

पूजनीय बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज ने जब पूज्य परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज को अपना मुरीद बनाया तब वचन फरमाए कि भाई आपको इसलिए अपने पास बिठाकर नाम दे रहे हैं, क्योंकि हमें आप से काम लेना है। आपको जिंदाराम का लीडर बनाएंगे, जो दुनिया से नाम जपाएगा। साईं जी ने यह समझाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी की उनका उत्तराधिकारी कौन होगा। लेकिन कुछ शंकावादी अपनी खुदी की दलदल में डूबे रहते हैं। संतों के पाक-पवित्र वचनों को भी वे कभी सत्य वचन नहीं मान पाते। लेकिन साईं मस्ताना जी महाराज ने 28 फरवरी 1960 को पूजनीय पिताजी को अपना उत्तराधिकारी घोषित करके 14 मार्च 1954 को फरमाए वचनों को सार्थक कर दिखाया।

ईश्वरीय दर्शन- साईं जी ने कहा भाई आओ, तुम्हें रब्ब की पैड़ दिखाए-

एक बार बेपरवाह साईं मस्ताना जी महाराज ने एक पावं के निशान को अपनी डंगोरी से घेरा बनाकर अपने साथ आए सेवादारों से कहा, भाई आओ, तुम्हें रब्ब की पैड़ दिखाते है। तब उनमें से एक सेवादार भाई कहने लगा यह पांव का निशान तो श्री जलालआणा साहिब के जैलदार हरबंस सिंह जी की है। इस पर साईं जी ने डंगोरी को जमीन पर ठोक कर वचन फरमाएं कि असीं किसी जैलदार को नहीं जानते, लेकिन यह रब्ब की पैड़ है।

साईं जी ने परम पिता जी को अपना रूप बनाया-

परम पिता जी जब से बेपरवाह साईं जी की दृष्टि में आए तब से ही बेपरवाह जी आप जी की परीक्षा लेते रहे। इस तरह साईं जी ने परम पिता जी की कठिन से कठिन परीक्षा ली और आखिर में आप जी को बेपरवाह साईं जी ने 28 फरवरी 1960 को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया और रूहानियत का बादशाह बनाया। पूजनीय बेपरवाह जी के हुक्मानुसार आप जी को सिर से पैरों तक नए-नए नोटों के लंबे-लंबे हार पहनाए गए।

लाखों लोगों से राम-नाम जपवाया-

परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज ने गद्दीनशीन होते ही 1960 से ही सत्संग करने शुरू कर दिए। लेकिन जीवो को नाम शब्द देना इसके 3 वर्षों बाद शुरू किया। परम पिता जी ने 1963 में नाम शब्द का मार्ग खोलकर रूहों को मोक्ष मुक्ति का अधिकारी बनाने का परोपकार किया। परम पिता जी ने 1960 से लेकर 1991 तक पूरे 31 वर्ष डेरा सच्चा सौदा का प्रचार प्रसार किया। इस दौरान आप जी ने लगभग 2250 गांव, शहरों व कस्बों में हजारों सत्संग आयोजित कर 11,08,429 लोगों को नाम शब्द प्रदान किया। आप जी ने अपने सुख- आराम की परवाह न करते हुए हरियाणा, पंजाब, राजस्थान व उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में प्रभावशाली सत्संग फरमाए और लोगों को सच के मार्ग से जोड़ा। आप जी ने 23 सितंबर 1990 को मौजूदा संत डॉक्टर गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां को अपना वारिस घोषित किया। आप जी सवा साल तक मौजूदा गद्दीनशीन पूज्य गुरु जी के साथ विराजमान रहे। उपरांत 13 दिसंबर 1991 को आप जी ज्योति-ज्योत समा गए। आप जी ने हजूर पिता जी को अपने जवां रूप में प्रकट कर के साथ महान परोपकार किया है। जिसकी मिसाल पूरी दुनिया में कहीं नहीं मिल सकती।

इन्सानियत की मिसाल बना डेरा सच्चा सौदा-

पूज्य बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज द्वारा स्थापित डेरा सच्चा सौदा को पूजनीय परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज ने अथक मेहनत की बदौलत पूरे भारतवर्ष में एक खास पहचान दी। शहर-शहर, गांव-गांव सत्संगे लगाकर लोगों को जहां बुराइयों के चंगुल से निकालकर प्रभु भक्ति के साथ सच्चे मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया, वहीं लोगों को अपने निजधाम सचखंड, अनामी का रास्ता दिखाया। मौजूदा समय में डेरा सच्चा सौदा विश्व भर में इंसानियत की मिसाल के रूप में अपनी नई पहचान बना चुका है। पूज्य गुरु संत डॉक्टर गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सा की पावन शिक्षाओं का अनुसरण करते हुए सैकड़ों या हजारों ही नहीं करोड़ों लोग समाज के हर सुख-दुख में शरीक हो रहे हैं। दुनिया भर में डेरा सच्चा सौदा के श्रद्धालु पूज्य गुरु जी के मार्गदर्शन में 129 मानवता भलाई कार्यो की अलख जगा रहे है।

निष्कर्ष-

हमारी तरफ से आप सभी को परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज के 102 वें पावन अवतार दिवस की सारी कायनात को अरबों-खरबों बार बधाई हो जी।

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