A commendable efforts for tribal upliftment

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आज के इस आधुनिक समय में जहां पर अत्यधिक लोग अपने जीवन को तमाम सुविधाओं के साथ जी रहे हैं। वहीं हमारे समाज का एक वर्ग ऐसा भी है, जिसमें लोग आदिवासियों के रूप में अपना जीवन व्यतीत करते हैं। उन लोगों को हमारे समाज में असभ्य माना जाता है और वे लोग समाज के तौर तरिकों से अंजान है। जिन्हें कपड़े पहनने, खाना बनाने व खाना खाने के बारे में अधिक जानकारी नहीं है।आजकल, हम में से बहुत से लोग उनके अस्तित्व के बारे में भी नहीं जानते हैं, और उनके भले व उत्थान के बारे में सोचना तो बहुत दूर की बात है। लेकिन समाज के नागरिक होने पर हम सभी का कर्तव्य बनता है कि हम इन लोगों के बारे में जाने व इनकी मदद करें।

भारत की लगभग 8.6% जनसंख्या आदिवासी-

आमतौर पर आदिवासी दो शब्दों से मिलकर बना है। आदि+वासी, जिसका अर्थ मूल निवासी होता है। आपको बता दे भारत की जनसंख्या का लगभग 8.6% भाग आदिवासी समुदाय का है। हमारे भारतीय संविधान में आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में रखा जाता है।

आदिवासियों के जीवन की एक झलक-

आपको बता दे, आदिवासी लोग हमारी सोच से परे क्षुद्र जीवन जी रहे हैं। उदयपुर जिले के राजस्थान, कोटरा और जाहडोल तहसीलों में, आदिवासी गरीबी, बीमारियों और भ्रम में रहते हैं। ये लोग जानवरों का मांस खाते थे व स्नान और स्वच्छता के बारे में नहीं जानते थे। यहां तक कि वे लोग वहां पर बिना कपड़ों के रहते हैं। पुरुष शराब और नशों के आदी रहते थे। जो अपने परिवारों के लिए जीवन नरक बना रहे थे। आदिवासी अन्य लोगों को अपने क्षेत्रों में प्रवेश करने की अनुमति नहीं देते थे और यदि कोई भी वहां जाने की हिम्मत करता है, तो यह लोग उन्हें मार देते थे। इस प्रकार सामाजिक मानदंडों, संस्कृतियों, कपड़ों की समझ, स्वच्छता और खाद्य पदार्थों के बिना, आदिवासी बहुत ही खराब व दयनीय परिस्थितियों में जीवन जी रहें थे और वे लोग सभ्य समुदाय से बहुत दूर थे।

बाल विवाह जैसी रूढ़ीवादी विचारधारा-

आदिवासियों में बहुत सी रूढ़ीवादी सामाजिक बुराइयाँ है। जिनमें से एक बाल विवाह है। आदिवासी छोटी उम्र में बच्चों की शादियां कर देते है। लड़कियां और लड़के घरों से भाग कर शादि कर लेते है। सबसे पहले वे शादी करते हैं और फिर बच्चों को जन्म देते हैं। गैर-किशोर उम्र में बच्चा पैदा करने के कारण, कई लड़कियां मर भी जाती हैं। इस प्रकार, वो लोग कई खतरनाक बीमारियों से ग्रस्त हैं। इसके साथ ही, वे लोग जानवरों का शिकार करके और उनका कच्चा मांस खाकर अपना पेट भरते हैं, जो उनमें कई बीमारियों का मुख्य कारण भी है। इस प्रकार की सामाजिक बुराइयाँ वहाँ मौजूद हैं।

आदिवासियों लोगों के जीवन ने लिया प्रगतिशील यू-टर्न:

पहले-

  • बच्चों के लिए शिक्षा की कोई व्यवस्था नहीं थी।
  • कोई सुनिश्चित आय का स्रोत नहीं था।
  • जानवरों के शिकार और लोगों को लूटने पर जीवन निर्भर था।
  • बाल विवाह जिससे उनके उज्जवल भविष्य की उम्मीद नहीं था।

बाद में-

  • आज बच्चों की शिक्षा के लिए बेहतर स्कूलों की व्यवस्था हो गई है।
  • औपचारिक शिक्षा के अवसर।
  • आजाविका कमाने के लिए प्रशिक्षण और स्थिर आय के स्त्रोत।
  • शाकाहारी भोजन को अपने जीवश में अपनाया।
  • लूटपाट का त्याग किया।
  • बाल विवाह के दुष्कर्मों से अवगत हुए।
  • सही उम्र में शादि करने का प्रण लिया।

आदिवासियों के उत्थान के लिए सैकड़ों अनुयायी आए आगे-

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आदिवासियों के लिए अविश्वसनीय काम करते हुए, वर्ष 2001 में सामाजिक व कल्याणकारी संगठन डेरा सच्चा सौदा के सैकड़ों अनुयायी अपने आध्यात्मिक गुरु जी के साथ आदिवासियों के उत्थान के लिए आदिवासी इलाकों यानी कोटडा़ और जाहडोल तहसीलों में गए। मारे जाने के डर के बिना, वे भगवान का नाम लेकर चले गए। आंतरिक रूप से शत्रुतापूर्ण और हिंसक आबादी से दोस्ती करने के लिए सहायता वितरण का एक निरंतर डोर टू डोर अभियान चलाया गया। डेरा सच्चा सौदा के अनुयायियों ने लगभग एक वर्ष वहां पर बिताया जब तक आदिवासी पूरी तरह से परिवर्तित नहीं हुए।

आदिवासियों को सभ्य बनाने के लिए डेरा सच्चा सौदा द्वारा किए गए विभिन्न प्रयास-

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डेरा सच्चा सौदा के अनुयायियों द्वारा आदिवासियों को सभ्य बनाने के लिए विभिन्न प्रयास किए गए। जैसे- उनको स्नान करना सिखाया, उनके नाखून काटें और उन्हें पहनने के लिए कपड़े दिए क्योंकि वे लोग पत्तियों के वस्त्र डालते थे। इसके अलावा, खाना कैसे बनाया जाए, क्या खाने लायक है या नहीं, सभी कार्य उन्हें बहुत अच्छी तरह से उन्हें सिखाए। अब धीरे-धीरे आदिवासी अच्छी आदतों को अपने जीवन में शामिल कर रहे हैं और सभ्य व्यक्तियों की तरह बेहतर जीवन जीने लगे हैं। इन स्वयंसेवकों ने इन आदिवासियों के उत्थान के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास किया है।

बाबा राम रहीम जी ने आदिवासी लोगों को नैतिक मूल्य व ध्यान की विधि से अवगत कराया-

करोडो़ लोगों के सच्चे व ध्यात्मिक गुरु संत डॉक्टर गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां द्वारा आदिवासी लोगों की स्थितियों को सुधारने के लिए कई प्रयास किए हैं। कोई भी इन्सान आदिवासी लोगों को जानने और उन्हें सभ्य बनाने के लिए नहीं सोच सकता था। लेकिन पूज्य गुरु जी ने उनके दर्द और पीड़ा को महसूस किया और उन्हें सच्चे जीवन का मतलब समझाने व उनकी सामाजिक बुराइयों को समाप्त करने के लिए पूज्य गुरुजी ने वहां पर कई सत्संग फरमाए। इन आदिवासियों ने किसी भी प्रकार के मादक पदार्थों या शराब का सेवन न करने, कभी मांसाहार ना खाने, और निर्दोष जानवरों को मारने से रोकने का संकल्प लिया है। उन्हें शादी का उचित तरीका सिखाया गया। इसके साथ ही, पूज्य गुरूजी ने आदिवासियों को सर्वोच्च शक्ति भगवान के साथ मिलाप कराने के लिए ध्यान की विधि बताई। पूज्य गुरु जी व सैकडो़ अनुयायियों के प्रयासों से, आदिवासियों की दिनचर्या में भारी बदलाव देखा गया।

आदिवासियों को आत्म निर्भर और सभ्य बनाने में अहम योगदान-

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आदिवासी जब गरीबी में अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे और वे जीवन के वास्तविक अर्थ को नहीं जानते थे। तब पूज्य गुरु जी इनके उत्थान के लिए कदम उठाए। पूज्य गुरु संत डॉक्टर गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां व उनके आनुयायियों द्वारा उन्हें व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदान किए गए। डेरा अनुयायियों द्वारा महिलाओं को सिलाई, बुनाई, हस्तशिल्प आदि कार्य सिखाए गए। इसके लिए पूज्य गुरु जी ने जुलाई 2001 में 300 लकड़ी के करघे और दिसंबर 2002 में 500 लोहे के करघे निःशुल्क उपलब्ध कराए गए। पुरुषों को कृषि और जल प्रबंधन का भी प्रशिक्षण दिए गए। बच्चों को स्कूल जाने के लिए व अच्छी शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया गया। इस प्रकार आदिवासियों को आजीविका कमाने व आत्म-निर्भर बनाने के लिए विभिन्न प्रकार के उपकरण और प्रशिक्षण प्रदान किए गए, और उन्होंने उन्हें सभ्य लोगों की तरह रहना सिखाया। पूज्य गुरु संत डॉक्टर गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां के महान प्रयासों से ही यह संभव हो पाया है।

Inspirational source behind this great initiative to ‘Reintegrating Tribals’-

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आदिवासी लोगों को सामाजिक मुख्यधारा से जोड़ने के लिए डेरा सच्चा सौदा उनके उत्थान के लिए सराहनीय कदम उठा रहा है। जो आध्यात्मिक और समाज-कल्याण संस्था डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख संत डॉक्टर गुरमीत राम रहीम सिंह इन्सां की पावन प्रेरणा से किया जा रहा है। पूज्य गुरु जी के पवित्र वचनों को सुनने व अपने जीवन में अपनाने के बाद, आज के समय में हजारों आदिवासी अपना सर्वश्रेष्ठ जीवन जी रहे हैं। 2005 से 2017 तक, डेरा सच्चा सौदा में जनजातीय समुदायों के 1629 विवाह सम्मपन्न हो चुके हैं। यह एक अच्छा परिवार और सामाजिक जीवन जीने की दिशा में एक बड़ा कदम है। पूज्य गुरुजी ने अपनी फिल्म ‘MSG-2 द मैसेंजर’ में भी आदिवासियों के पुनर्निवेश की यात्रा को दिखाया है। यदि आप यह जानने के लिए उत्साहित हैं कि गुरुजी ने उनके जीवन को कैसे बदल दिया है, तो आप इस फिल्म को

इस लींक के माध्यम से देख सकते है।

Conclusion-

यह सब देखकर, माना जा सकता हैं कि इस दुनिया में मानवता अभी भी जीवित है। जहां लोग दूसरों को बेहतर व अच्छा जीवन प्रदान करने के लिए कई महींने निःस्वार्थ भाव से लगाते हैं। डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख संत डॉ गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां व उनको करोड़ों अनुयायी निःस्वार्थ भाव से मानवता की सेवा के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। आदिवासियों के उत्थान लिए उठाया गया सराहनीय कदम 134 मानवता भलाई कार्यों में से एक है।

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