61st Guru Gaddi Diwas of Shah Satnam Ji

रूहानी बख्शिश का होना अध्यात्मिकतावाद का एक अनोखा व बडा़ ही दुर्लभ दृश्य है। कोई ईश्वरीय ताकत ही इस ुकाम को हासिल कर सकती है। बेशक वह आम लोगों के बीच रहकर उन्हीं की तरह अपना जीवन व्यतीत करती है, परंतु उस ताकत का भेद उचित समय आने पर ही खुलता है। इस रहस्य को खोलना उस से भी अधिक महत्वपूर्ण है। क्योंकि एक जलता हुआ दीप ही दूसरे दीपकों को प्रज्ज्वलित कर सकता है। इसी तरह कोई रूहानी ताकत ही किसी रूहानी ताकत को प्रकट कर सकती है। यह कार्य कोई आम इंसान नहीं कर सकता। कोई सच्चा व पूर्ण फकीर ही अपने स्वरूप को पहचान सकता है और वही पूर्ण फकीर ही उसे दुनिया के सामने प्रकट कर सकता है और वही पूरी दुनिया को अटल सच्चाई से रू-ब-रू करवा सकता है। उस ताकत के जाहिर होने का एक निश्चित समय, दिन, तारीख व घड़ी आदि सब कुछ एक विधान के अनुसार ही तय होता है। इसी विधान के अनुरुप 28 फरवरी 1960 का वह स्वर्णिम दिन है जो डेरा सच्चा सौदा के लिए एक ऐतिहासिक दिन है।

एतिहासिक पन्नों में दर्ज हुआ 28 फरवरी का स्वर्णिम दिन-

हरियाणा के सिरसा जिले में स्थित डेरा सच्चा सौदा के लिए 28 फरवरी का दिन बडा़ ही गौरवशाली, वैभव से भरपूर तथा मानवता की मिसाल कायम करता एक ऐसा ऐतिहासिक दिन है, जो डेरा सच्चा सौदा के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। आपको बता दें, इस दिन पूज्य बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज ने परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज को अपना उत्तराधिकारी बनाकर दुनिया के सामने जाहिर किया और सतनाम रूपी महान ताकत से लोगों को रू-ब-रू करवाया।

आपको बता दे डेरा सच्चा सौदा के संस्थापक बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज ने परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज को ना केवल प्रकट किया, बल्कि दुनिया को यह भेद भी खोल कर बताया कि ‘ये वहीं सतनाम है जिनके सहारे सारे खंड ब्रह्मांड हैं’। जिनका नाम दुनिया जपती-जपती मर गई लेकिन किसी को मिला नहीं। वह रब्बी मौज डेरा सच्चा सौदा में प्रकट स्वरूप में मौजूद है। शहंशाह मस्ताना जी महाराज ने इस पावन दिवस पर ऐसा रहमोकरम फरमाया कि दुनिया को कुल मालिक के दर्शन करवा दिए। डेरा सच्चा सौदा के लिए यह एक महान दिवस है, जिसे साध-संगत महा रहमोकरम दिवस के रूप में मनाती है। मौजूदा गुरु संत डॉ गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां के पावन सानिध्य में इस शुभ दिवस को बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है जिसमें देश-विदेश से आकर अनुयायी शिरकत करते हैं और अलौकिक खुशियों का आनन्द मानते हैं।

अलौकिक जीवन परिचय-

पूज्य परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज ने 25 जनवरी 1919 को पूज्य पिता सरदार वरियाम सिंह सिद्धू जी के घर, पूजनीय माता आस कौर जी की पाक-पवित्र कौख से इकलौती संतान के रूप में अवतार धारण किया। आप जी गांव श्री जलालआणा साहिब, तहसील मंडी डबवाली, जिला सिरसा, हरियाणा के रहने वाले थे। ईश्वर भक्ति की लग्न आप जी के अंदर पूज्य माता-पिता जी के पवित्र संस्कारों के फल स्वरुप बचपन से ही थी। जैसे-जैसे आप जी बड़े होते गए, आप जी के अंदर ‘सच’ व ‘मालिक’ को देखने और सब गमों को मिटाने वाली सच्ची वाणी को पाने की तड़प भी निरंतर बढ़ती गई। आप जी उस सच्ची वाणी की खोज में लग गए। एक बार आप जी डेरा सच्चा सौदा सिरसा के पूज्य बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज के सत्संग में आए। पूज्य बेपरवाह मस्ताना जी महाराज के रब्बी स्वरूप व इलाही वचनों में आप जी ने उस सच को देखा, जिसकी आप जी को बचपन से तलाश थी। आप जी ने उसी दिन से पूज्य बेपरवाह साईं जी को सच्चे दिल से अपना अल्लाह, राम, वाहेगुरु व खुदा सब कुछ मान लिया।

नाम-शब्द की प्राप्ति-

पूज्य बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज ने 14 मार्च 1954 को घूंकावाली में सत्संग फरमाया। पूज्य साईं जी ने आप जी को बुलवाया और आवाज देकर फरमाया कि सरदार हरबंस सिंह जी आज आप जी को नाम शब्द लेने का हुक्म हुआ है। आप अंदर हमारे मुढे़ के पास जाकर बैठो, हम अभी आते हैं। आप जी ने अपने खुदा के वचन को सत् वचन कर माना। अंदर और भी कई लोग नाम शब्द लेने के लिए बैठे हुए थे। मुढे़ के पास खाली जगह नहीं थी, इसलिए आप भी उन लोगों के पीछे बैठ गए। पूज्य बेपरवाह साईं जी ने आप जी को अपने मूढ़े के पास बिठाते हुए वचन फरमाए, आपको इसलिए पास बिठाकर नाम देते हैं कि आपसे कोई काम लेना है। आपको जिंदाराम का लीडर बनाएंगे, जो दुनिया से नाम जपवाएगा।

सख्त से सख्त परीक्षा -

पूज्य बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज ने परम पिता जी को पहले दिन से ही अपनी नूरी नजर में ले लिया था और उसी दिन से ही आप जी को अपना वारिस मान कर आप जी की कदम-कदम पर परीक्षा लेनी भी आरंभ कर दी थी। घर-बार, हवेली, मकान तुड़वा कर लुटाने आदि जैसी सख्त से सख्त परीक्षा लेने के बाद पूज्य बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज ने परम पिता जी का नाम सरदार हरबंस सिंह जी से बदल कर सरदार सतनाम सिंह जी रखते हुए फरमाया कि ‘सरदार’ हरबंस जी आपकी कुर्बानी के बदले हम तुम्हें ‘सत’ देते हैं, तुम्हें ‘सतनाम’ करते हैं।

बेपरवाह साईं जी ने कुल मालिक शाह सतनाम सिंह जी को जग मे जाहिर किया-

हर तरह से सख्त से सख्त परिक्षा लेने के बाद आखिरकार वह स्वर्णिम दिन आया, जब शाह मस्ताना जी महाराज ने 28 फरवरी 1960 के दिन परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज को गुरुगद्दी सौंपी व डेरा सच्चा सौदा के दूसरे अध्यात्मिक गुरु के रूप में अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। पूज्य साईं जी के आदेशानुसार इस शुभ दिन के लिए पंजाब, राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली आदि दूर के इलाकों से साध-संगत को डेरा सच्चा सौदा में बुलवा लिया गया था। पूज्य साईं जी ने डेरे में मौजूद सारी साध-संगत को हुक्म दिया कि सिरसा शहर की हर गली, हर मोहल्ले में शोभा-यात्रा निकालनी है, ताकि बच्चे-बच्चे को यह पता चल जाए कि श्री जलालाआणा साहिब वाले सरदार हरबंस सिंह जी ने इतनी जबरदस्त कुर्बानी दी है। सतगुरु के हुक्म से इन्हें आज से ही सच्चा सौदा का वारिस बना दिया गया है। इस प्रकार 28 फरवरी 1960 का वह पावन दिवस डेरा सच्चा सौदा के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखा गया है।

सच्चे संत दयालुता के प्रतीक- लाखों लोगों को बख्शा नया जीवन

सच्चे संत बडे़ ही दयावान व दयालुता के प्रतीक होते हैं। उनका धरती पर अवतार धारण करने का एकमात्र उद्देश्य मानवता की भलाई करना होता है। ऐसे ही परम दयालु शाह सतनाम सिंह जी महाराज हुए जिन्होनें 1963 से 1990 तक लगातार 27 वर्षों तक लाखों लोगों को ध्यान की सच्ची विधि बताई और लोगों की बुराइयां छुड़वाई। परम पिता जी ने हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में लगभग 2250 गांवो में रुहानी सत्संग फरमाए व लोगों को अपने पावन आशीर्वाद से सराबोर किया। परम पिता जी ने समाज उद्धार के लिए कई पवित्र ग्रथों की रचना की। आप जी ने 23 सितंबर 1990 को पूज्य हजूर पिता संत डॉक्टर गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां को अपना उत्तराधिकारी बनाया व आप जी लगभग सवा साल तक पूज्य हजूर पिता जी के साथ स्टेज पर विराजमान रहे और लोगों में किसी भी शंका की कोई गुंजाइश नहीं छोडी़। लंबे समय तक, दोनों पातशाहियों के साथ-साथ प्रकट रूप में रहने के बाद आप जी ने 13 दिसंबर 1991 को ज्योति जोत समा कर, अपने आप को भी पूर्ण तौर पर पूज्य गुरु जी के मौजूदा रुप में परिवर्तित कर लिया।

डेरा सच्चा सौदा के तीन सिद्धांत-

1. मांस-अंडे का सेवन नहीं करना।

2. शराब का सेवन नहीं करना।

3. रिश्तों के प्रति वफादार होना यानी जायज रिश्ता अख्त्यार करना।

अवर्णनीय रहमोकरम-

साध-संगत के प्रति आप जी के अनगिणत परोपकार हैं। आप जी की दया मेहर रहमतों का लिख-बोलकर वर्णन नहीं किया जा सकता है। डेरा सच्चा सौदा के राम नाम की सच्चाई व ईमानदारी का आज पूरी दुनिया में डंका बज रहा है। पूज्य हजूर पिता जी की पावन रहनुमाई में डेरा सच्चा सौदा चारों दिशाओं में अपने 134 कल्याणकारी कार्यों की गंगा बहा रहा है। पूज्य गुरु संत डॉक्टर गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां समाज में बदलाव लाने के उद्देश्य से दिन-रात जुटे हुए हैं। पूज्य गुरुजी के अथक प्रयासों की बदौलत आज देश-दुनिया के 6 करोड़ से भी अधिक लोग नशा, वेश्यावृत्ति व सामाजिक बुराइयों को छोड़कर ईश्वर की भक्ति से जुड़े हुए हैं। घर-घर में प्यार की गंगा बह रही है। हम दिल से यही कामना करते हैं कि हर कोई इन खुशियों को ग्रहण करे तथा अपने जीवन को खुशहाल बनाए।

निष्कर्ष-

पूज्य गुरु संत गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां के वचनानुसार पूजनीय परम पिता जी शाह सतनाम सिंह जी महाराज के पावन गुरुगद्दीनशीनी दिवस 28 फरवरी के दिन को डेरा सच्चा सौदा में महा रहमोकरम दिवस के रुप में प्रत्येक वर्ष भंडारे के तौर पर परोपकारी कार्य करके मनाया जाता है। आप सभी को पाक-पवित्र 61वें ‘महा रहमोकरम दिवस’ की हार्दिक शुभकामनाएं! प्यारे गुरु शाह सतनाम सिंह जी महाराज को हमारा कोटि कोटि नमन!

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